समान नागरिक संहिता क्या है (UNIFORM CIVIL CODE)

आजकल सभी और चर्चा हो रही है समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UNIFORM CIVIL CODE) की. कोई कहता है समान नागरिक संहिता लाना चाहिए तो कोई कहता है नहीं लाना चाहिए।

इस विषय पर सबकी अपनी-अपनी सोच हैं। आज के इस ब्लॉग आर्टिकल में हम यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform Civil Code in Hindi) पर विस्तार से जानने वाले है

समान नागरिक संहिता क्या है,UNIFORM CIVIL CODE in hindi, अनुच्छेद 44, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
समान नागरिक संहिता

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क्या है समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code in Hindi)

समान नागरिक संहिता भारत के लिए एक कानून बनाने का आह्वान करता है, जो विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में सभी धार्मिक समुदायों पर एक जैसा लागू होगा।

समान नागरिक संहिता ये संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत आती है, जो ये बताती है कि राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगे। 

ये मुद्दा एक सदी से अधिक समय से राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में रहा है और भारतीय जनता पार्टी (भा. ज. पा.) के लिए ये प्राथमिकता का एजेंडा है, जो संसद में कानून बनाने के लिए जोर दे रही है। 

सत्ता में आने पर समान नागरिक संहिता को लागू करने का वादा करने वाली पहली भारतीय जनता पार्टी थी और ये मुद्दा 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के घोषणापत्र का हिस्सा था।


अनुच्छेद 44 क्यों महत्वपूर्ण है (Article 44 in Hindi)

भारतीय संविधान में निदेशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 44 का उद्देश्य कमजोर समूहों के खिलाफ भेदभाव को दूर करना और देश भर में विविध सांस्कृतिक समूहों के बीच तालमेल बिठाना था। डॉ आंबेडकर जी ने संविधान बनाते समय कहा था कि एक समान नागरिक संहिता वांछनीय है।

लेकिन फिलहाल इसे स्वैच्छिक रहना चाहिए और इस प्रकार संविधान के मसौदे के अनुच्छेद 35 को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के भाग IV में जोड़ा गया था। 

भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 के रूप में शामिल किया गया था। इसे एक पहलू के रूप में संविधान में शामिल किया गया था जो तब पूरा होगा जब राष्ट्र इसे स्वीकार करने के लिए तैयार होगा और समान नागरिक संहिता की सामाजिक स्वीकृति बनाई जा सकेगी।

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समान नागरिक संहिता की उत्पत्ति

समान नागरिक संहिता की उत्पत्ति औपनिवेशिक भारत में हुई थी जब ब्रिटिश सरकार ने 1835 में अपराधों, सबूतों और एग्रीमेंट्स से संबंधित भारतीय कानून के संहिता में एकरूपता की आवश्यकता पर बल देते हुए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। 

विशेष रूप से अनुशंसा करते हुए कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को ऐसे संहिताकरण से बाहर रखा जाए।


क्या है हिन्दू पर्सनल लॉ

भारत में हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल (Hindu Code Bill) लाया गया। इसके विरोध में देश भर में हुए विरोध प्रदर्शन के बाद हिंदू कोड बिल को चार हिस्सों में बांट दिया गया था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे हिंदू मैरिज एक्ट, हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट, हिंदू सक्सेशन एक्ट और हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट में बांट दिया। 

हिंदू कोड बिल कानून ने महिलाओं को सीधे तौर पर सशक्त बनाया है। इस बिल के तहत महिलाओं को पैतृक और पति की संपत्ति में अधिकार मिलता है।

इसके अलावा दूसरी जाति के लोगों के साथ शादी करने का अधिकार भी मिलता है, पर कोई भी व्यक्ति एक शादी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता है। और यदि कोई हिंदू पहली शादी होते हुए भी दूसरी शादी करता है तो वो कायदे से अवैध होगी। 

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मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

देश के मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बनाया है। इसके लॉ के अंतर्गत शादी शुदा मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महज तीन बार ‘तलाक’ (तलाक- तलाक- तलाक) कहकर तलाक दे सकते थे।

हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक देने के  लिए और भी तरीके उपलब्ध हैं, लेकिन उनमें से केवल तीन बार तलाक भी एक प्रकार का तलाक माना गया था। पर केंद्र सरकार ने संसद से बिल पास कर तीन तलाक कहकर तलाक देने की प्रथा को अवैध कर दिया है. 


पर्सनल लॉ क्या है

धर्म, जाति, आस्था के आधार पर लोगों के एक निश्चित समूह या धर्म के लोगों पर लागू होने वाले कानून, रीति-रिवाजों और धार्मिक ग्रंथों के आधार पर उस धर्म के लोगों के लिया पर्सनललॉ बनाए जाते हैं।

हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों का स्रोत और अधिकार उनके धार्मिक प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।


क्यों है देश में समान नागरिक संहिता की आवश्यकता

अलग-अलग धर्मों के अलग कानून होने की वजह से न्यायपालिका पर अधिक बोझ पड़ता है। समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में सालों से लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द हो सकेंगे जिससे पीड़ित, शोषित को न्याय मिलेगा।

शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद में हिस्से के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा तो फिर चाहे वो किसी भी जाती-धर्म का क्यों न हो। वर्तमान में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा करने के लिए पर्सनल लॉ हैं।

सभी के लिए कानून में एक समानता से देश में एकता और समानता बढ़ेगी और जिस देश में नागरिकों में एकता का भाव निर्माण होगा। 

जिस देश में किसी के साथ किसी भी प्रकार वैमनस्य नहीं होता है वो देश तेजी से विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा। देश में हर भारतीय को एक समान कानून लागू होने से देश की राजनीति पर भी असर पड़ेगा और राजनीतिक पार्टी केवल वोट बैंक वाली राजनीति नहीं कर सकेंगे और वोटों का ध्रुवीकरण नहीं होगा।  


समान नागरिक संहिता लागू होने से महिलाओं की स्थिति में क्या सुधार होगा

समान नागरिक संहिता लागू होने से भारतीय महिलाओं की स्थिति में भी सुधार देखने को मिलेगा। कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं।

इतना ही नहीं कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे। 


किन देशों में लागू है यूनिफॉर्म सिविल कोड

एक तरफ भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर बड़ी बहस चल रही है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान, मलेशिया, बांग्लादेश, सूडान, तुर्की, इंडोनेशिया और इजिप्ट जैसे कई देशों में समान नागरिक संहिता कानून को लागू कर चुके हैं।


आपराधिक कानून और नागरिक कानून के बीच अंतर

भारत में आपराधिक कानून (Criminal Law) एक समान हैं और सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उनकी धार्मिक मान्यताएं कुछ भी हों। 

नागरिक कानून (Civil Law) आस्था से प्रभावित होते हैं। धार्मिक ग्रंथों से प्रभावित होकर दीवानी मामलों में लागू होने वाले पर्सनल लॉ को हमेशा संवैधानिक मानदंडों के अनुसार लागू किया गया है।


क्या करेगी समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code in Hindi) का उद्देश्य महिलाओं और अल्पसंख्यकों सहित, कमजोर वर्गों को सुरक्षा प्रदान करना है, साथ ही एकता के माध्यम से राष्ट्रवादी उत्साह को बढ़ावा देना है।

जब ये समान नागरिक संहिता बनाई जाएगी तो ये  उन कानूनों को सरल बनाने का काम करेगा जो वर्तमान में हिंदू कोड बिल, शरीयत कानून और अन्य जैसे धार्मिक विश्वासों के आधार पर अलग-अलग पर्सनल लॉ बने हैं।

ये समान नागरिक संहिता विवाह समारोहों, विरासत, उत्तराधिकार और गोद लेने से संबंधित जटिल कानूनों को सरल बनाएगी, जिससे भारत के सभी धर्मों के लिए एक ही कायदा होगा। 


देश के सिर्फ एक राज्य में लागू है समान नागरिक संहिता 

अब तक आपने अलग-अलग राज्यों के अलावा केंद्र सरकार की तरफ से समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code in Hindi) लागु करने की बात सुनी ही होगी पर इस पर आगे कोई अमल नहीं हो पाया है।

भारत का सिर्फ एक ही राज्य ऐसा है जहां पर समान नागरिक संहिता लागू है. उस राज्य का नाम है गोवा (Goa) ! इस राज्य में पुर्तगाल सरकार ने ही समान नागरिक संहिता लागू की थी। 1961 में गोवा सरकार समान नागरिक संहिता के साथ ही बनी थी। 


समान नागरिक संहिता का विरोध क्यों हो रहा

जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते है ठीक ऐसे ही कुछ लोग समान नागरिक संहिता का विरोध भी कर रहें हैं. इस के विरोध करने वाले लोगों का कहना हैं कि समान नागरिक संहिता लेने से सभी धर्मों पर हिंदू कानून थोपा जाएगा.

विरोध करने वाले यहाँ तक कहते हैं कि समान नागरिक संहिता से अनुच्छेद 25 के तहत मिले हुए अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।

आपको बता दूँ कि अनुच्छेद 25 भारतीय नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है. इस का सबसे ज्यादा विरोध मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कर रहा है. 

समान नागरिक संहिता से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदुओं को हमने इस लेख में सम्मिलित किया है जो कि परीक्षा की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है आशा करते हैं या लेखक को समझ में आया होगा


संक्षिप्त प्रश्नों के उत्तर

भारत के किस राज्य में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू है?

भारत में मात्र गोवा ही एक ऐसा राज्य है जहां पर समान नागरिक संहिता लागू है हालांकि उत्तराखंड में उत्तराखंड की कैबिनेट ने भी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने का निर्णय लिया है

एक देश एक कानून का क्या मतलब है?

अगर किसी देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू किया जाता है तो इस स्थिति में सभी जाति, धर्म और व्यक्ति के लिए एक ही कानून समान रूप से लागू किया जाएगा इस स्थिति में कोई भी धर्म और जाति अपना अलग से कानून नहीं बना पाएगी और इसी को एक देश एक कानून भी कहा जाता है

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना कब हुई?

1972 में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना की गई थी

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