नर्मदा बचाओ आंदोलन क्या है, इसका उद्देश्य व विरोध के कारण 

नर्मदा बचाओ आंदोलन राष्ट्रीय स्तर का पहला आंदोलन बना जिसका सम्बन्ध पर्यावरण और विकास से था।

इस आंदोलन में ना केवल विस्थापित लोग शामिल हुए बल्कि गैर सरकारी संगठन, वैज्ञानिक और जनता ने भी सहयोग किया। आम जनता भी इस आंदोलन में कूद पड़ी थी। 

नर्मदा बचाओ आंदोलन किससे संबंधित है

जवाहरलाल नेहरू ने 5 अप्रैल,1961 में सरदार सरोवर बांध परियोजना का उद्घाटन नर्मदा नदी पर किया। इस बांध की ऊँचाई 138.68 मीटर, गहराई 163 मीटर, लंबाई 1200 मीटर है।

इस परियोजना में मध्य प्रदेश के नर्मदा सागर बाँध और गुजरात के सरदार सरोवर जैसे दो बहु उद्देशीय परियोजनाओं का बटवारा किया गया था।

परन्तु इसमें तीन राज्यों-गुजरात, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के मध्य एक उपयुक्त जल वितरण नीति पर कोई सहमति नहीं थी। 

जिसके चलते सरकार ने 1969 में नर्मदा जल विवाद न्यायधिकरण का गठन कर दिया जिससे जल संबधी विवाद का हल निकल सके और इस परियोजना को शुरू किया जा सके। 

1979 में न्यायधिकरण सर्वसम्मति हुयी जिसके परिणाम स्वरुप नर्मदा घाटी परियोजना बनी। इस योजना में नर्मदा नदी और उसकी 4134 नदियों पर दो विशाल बांधों की योजना बनी इसमें गुजरात में सरदार सरोवर बांध व् मध्य प्रदेश में नर्मदा सागर बांध के अंतर्गत 28 मध्यम बांध और 3000 जल परियोजनाओं के निर्माण को सम्मिलित किया गया।  

नर्मदा घाटी परियोजना का उद्देश्य 

  • इस परियोजना हेतु 1985 में विश्व बैंक द्वारा 450 करोड़ डॉलर का लोन देने की घोषणा हुयी। 
  • सरकार के मुताबिक इस परियोजना द्वारा मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान के जो सूखा ग्रस्त क्षेत्र है उन्हें सिंचाई के लिए जल मिलेगा,यह क्षेत्र लगभग 2.27 करोड़ हेक्टेयर है। 
  • इसके साथ ही पीने का पानी भी मिलेगा। क्षेत्र में आने वाले बाढ़ को भी रोका जा सकेगा।

नर्मदा बचाओ आंदोलन में शामिल नेता कौन थे? 

मेधा पाटकर इस आंदोलन की संस्थापक थी। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्त्ता और समाज सुधारक के रूप में कार्य किया साथ ही वह राजनीतिज्ञ भी थी। 

नर्मदा बचाओ आंदोलन में मेधा पाटकर के साथ साथ बाबा आम्टे, अरुंधति रॉय, अनिल पटेल जैसे लोग भी शामिल थे। 

नर्मदा बचाओ आंदोलन का आरंभ  

1985 में नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध बनाने की सुचना मेधा पाटकर को लगी तो वह अपने अन्य सहयोगियों के साथ वहां पर पहुंची।

वहां उन्हें पता चला की बांध निर्माण में पुनर्वास करने वाले लोगो को कई चुनोतियो का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें बांध से सम्बंधित कोई जानकारी भी नहीं दी गयी है। 

तब मेधा पाटकर ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इसके विरोध में प्रदर्शन करना शुरू किया। जिसके स्वरुप 1988-89 में नर्मदा बचाओ आंदोलन की शुरुआत हुयी। 

बता दे कि 1980-1987 में गैर सरकारी संस्था अंक वाहनी के नेता अनिल पटेल ने जनजातीय लोगों के पुनर्वास हेतु सर्वोच्च न्यायालय में उनके अधिकार को दिलाने के लिए अपील की।

1987 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर गुजरात सरकार ने ’पुनर्वास नीति’ बनायीं। 

 मेधा पाटकर ने 1989 में नर्मदा बचाओ आन्दोलन के जरिये सरदार सरोवर परियोजना का खुल कर विरोध किया। साथ ही लोगों के पुनर्वास में आ रही समस्याओं को सबके सामने लेकर खड़ा किया। 

इस आंदोलन ने धीरे धीरे विशाल रूप ले लिया। इससे कई किसान ,महिलाये, आदिवासी, कार्यकर्त्ता जुड़ गए। इसके विरोध में कई हड़ताल की गयी। पदयात्राएं हुयी और सरकार तक अपनी बात को पहुंचाने का प्रयास किया गया। 

नर्मदा बचाओ आंदोलन बना ’विनाशकारी विकास’ 

मध्यप्रदेश के हारसूद में सितम्बर,1989 को एक आम सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में 200 से ज्यादा गैर सरकारी संगठनों के लगभग 45000 लोग शामिल हुए। 

बता दे कि पर्यावरण के विषय में होने वाली यह अब तक की सबसे बड़ी सभा थी जिसमे रैली भी निकाली गयी। भारत के समाज सेवी व् गैर सरकारी संगठन इस रैली का हिस्सा बने। इस रैली में इस विरोध को  ’विनाशकारी विकास’ नाम मिला। 

नर्मदा बचाओ आंदोलन के मुख्य कारण  

नर्मदा बचाओ आंदोलन वर्ष 1985 से देश के चार राज्यों हेतु महत्त्वपूर्ण सरदार सरोवर परियोजना का विरोध कर रहा है।

क्यूंकि इस परयोजना से कई आदिवासियों और गरीब लोगो का पुनर्वास करना पड़ा साथ ही वन भूमि को भी काफी क्षति हुई। 

  • बाँध निर्माण के वक्त वनों की कटाई से पर्यावरण पर असर पड़ेगा। 
  • सरदार सरोवर बांध की ऊँचाई यदि बढ़ती है तो इससे 37000 हेक्टेयर का क्षेत्र जलमग्न हो जायेगा। जिससे 13000 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होंगे। ऐसा होने से वनो को भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा।
  • बाँध का जलस्तर बढ़ने से एक लाख से अधिक लोगों को उनकी जगह से विस्थापित होना पङेगा।
  • इस बांध निर्माण से करीब 450 गाँव पानी में जलमग्न हो जाते। साथ ही बांध का पानी बढ़ने से एक लाख से ज्यादा लोगो को उनकी जगह से हटाना होगा।  
  • इस बांध निर्माण से लाखो लोगो के जीवन पर भी असर पड़ने वाला था उनके रोजगार और जीने का साधन ख़त्म हो जायेगा। 
  • इस आंदोलन की प्रमुख नेता मेधा पाटकर का यह आरोप है कि सर्वाच्च न्यायालय के आदेश देने के पश्चात भी बांध से ग्रसित लोगों को मुआवजा नहीं मिला है और न ही उनका पुनर्वास उन्हें मिला है। बल्कि बांध के जलस्तर को और ज्यादा बढ़ा दिया गया है।   
  • नर्मदा बचाओ आंदोलनकारियों की यह मांग थी कि जलस्तर को बढ़ाया न जाए। सबसे पहले पुनर्वास किया जाये फिर उसके पश्चात् विस्थापन हो। 
  • इस बांध के निर्माण से आकड़ो के मुताबिक मध्य प्रदेश के लगभग चार जिले प्रभावित हुए जिसमे 23,614 परिवार प्रभावित हुए। 

मेधा पाटकर और उनके सहयोगियों को इस आंदोलन के चलते कई कड़ी चुनोतियो का सामना करना पड़ा। मेधा को जेल तक भेजा गया परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी।

एक तरह से आंदोलन सफल रहा। पर्यावरण को होने वाले नुकसान और लोगो के पुनर्वास को लेकर जो चुनोतियाँ थी उसकी जानकारी सरकार के कानो तक पहुंची। 

केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा पर्यावरण की सुरक्षा हेतु कई दिशा निर्देश लागू किये गए। साथ ही सरकार ने भी बांध निर्माण के साथ कई और नियम बनाये जिससे पर्यावण को हानि न हो साथ ही लोगो के पुनर्वास की समस्या को भी कम किया जा सके।

इस नर्मदा बचाओ आंदोलन ने सरकार को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि किसी भी विकास के साथ साथ हमें पर्यावरण के बारे में भी सोचना चाहिए।   

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