खिलाफत आंदोलन और उस आंदोलन के परिणाम

भारत और दुनिया के कई सारे बड़े आंदोलनों में से एक खिलाफत आंदोलन भी था | खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement) जिसे भारतीय मुस्लिम आंदोलन (1919–24) के रूप में भी जाना जाता है।

ब्रिटिश भारत के मुसलमानों द्वारा शौकत अली, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान और अबुल कलाम आजाद के नेतृत्व में खलीफा को पुनर्स्थापित करने के लिए शुरू किया गया ये एक अखिल-इस्लामी राजनीतिक विरोध अभियान था। 

खिलाफत आंदोलन, Khilafat Movement Hindi, खिलाफत आंदोलन का इतिहास

ओटोमन खलीफा, जिसे सुन्नी मुसलमानों का नेता माना जाता था। खलीफा को एक प्रभावी धार्मिक और राजनीतिक अधिकार के रूप में माना जाता था।

ये प्रथम विश्व युद्ध (First World War) के बाद सेवर्स की संधि (Treaty of Sevres) द्वारा खलीफा और तुर्क साम्राज्य पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध के रूप में किया गया आंदोलन था। 

1922 के अंत तक खिलाफत आंदोलन ढह गया जब तुर्की राष्ट्रवाद की ओर बढ़ गया और 1924 तक, तुर्की ने खलीफा की भूमिका को समाप्त कर दिया था।

“खिलाफत आंदोलन” का भारत की स्वतंत्रता दिलाने में बहुत बड़ा रोल रहा है. आज के इस ब्लॉग आर्टिकल में हम खिलाफत आंदोलन के बारे में विस्तार से जानने जा रहे है. 


खिलाफत आंदोलन की पार्श्वभूमि

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान केंद्रीय शक्तियों के पक्ष में रहने वाले ओटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) को बड़ी सैन्य हानि के साथ हार का सामना करना पड़ा था।

वर्साय की संधि (Versailles Treaty) ने ओटोमन साम्राज्य की क्षेत्रीय सीमा को कम कर दिया और इसके राजनीतिक प्रभाव को सीमित कर दिया लेकिन विजयी यूरोप के शक्तिशाली देशों ने खलीफा के रूप में तुर्क सुल्तान की रक्षा करने का वादा किया।

हालांकि, सेवर्स की संधि (1920) के तहत, सीरिया, फिलिस्तीन, लेबनान और इराक जैसे क्षेत्रों को ओटोमन साम्राज्य से अलग कर दिया गया था।

उसके बाद तुर्की में प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी आंदोलन उभरने लगे जैसे “तुर्की राष्ट्रीय आंदोलन” (Turkish National Movement) के रूप में जाना जाता है।

तुर्की के स्वतंत्रता संग्राम (1919-1923) के दौरान, मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में तुर्की क्रांतिकारियों ने 1923 में लॉज़ेन की संधि (Treaty of Lausanne) के साथ सेवर्स की संधि को समाप्त कर दिया।

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खिलाफत आंदोलन का इतिहास

जब प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद अलग-अलग साम्राज्यों पर शासन करने के लिए होड़ मच गई। इस दौरान जर्मनी के साथ साथ तुर्की को पराजय का सामना करना पड़ा था।

इसके साथ ही तुर्की और ब्रिटेन के बीच होने वाली सीवर्स की संधि से तुर्की के सुल्तान के पूरे अधिकार छीन लिए गए थे। जिस वजह से तुर्की का आस्तित्व पूरी तरह खतरे में आ गया था।

क्योंकि उस समय “खलीफा (caliph)” मुस्लिमों का सबसे बड़ा नेता व प्रतिनिधि माना जाता था। इसलिए जो प्रस्ताव इस खिलाफत को खत्म करने के लिए लाया गया उसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा।

क्योकि, इससे भारतीय सहित पूरी दुनिया के मुस्लिमों की भावनाएं बेहद आहत हुईं थी।

इसलिए भारतीय मुस्लिमों के एक वर्ग ने राष्ट्रीय स्तर पर खिलाफत आंदोलन का आरम्भ किया और औपनिवेशी ब्रिटिश सरकार को जमकर कोसा।

और तो और अंग्रेजों के विरोध में लामबंदी भी की गई। वहीं खिलाफत आंदोलन में महात्मा गांधी सहित अन्य बड़े नेताओं ने भी अहम भूमिका अदा की थी।

महात्मा गांधी ने खिलाफत आंदोलन को हिन्दू और मुस्लिम की एकता के लिए ठीक समझा इसलिए उन्होनें मुस्लिमो के प्रति अपनी संवेदनाएं दिखाई।

दरअसल जब ‘अखिल भारतीय खिलाफत सम्मेलन’ (All India Khilafat Conference) का आयोजन हुआ था, तब अंग्रेजी वस्तुओं और सेवाओं पर बहिष्कार की मांग की गई।

इसके साथ खिलाफत आंदोलन के नेताओं ने ये भी कहा कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की पर थोपी गई संधि शर्तों को जब तक वापस नहीं या सरल नहीं बनाया जाता, तब तक वे ब्रिटिश सरकार को किसी भी तरह का समर्थन नहीं करेंगे। 

उसी दौरान हर तरफ से भारतीयो पर अपनी कटु नीतियों के तहत दबाव बना रहे थे और भारतीयों को धोखे में रखा जा रहा था, जिससे अखिल भारतीय कांग्रेस भी भलीभांति वाकिफ थी।

इसलिए खिलाफत आंदोलन के रूप में एक बड़ा राजनीतिक आंदोलन खड़ा हुआ जो हिंदू और मुस्लिमों की एकता के लिए ब्रिटिशर्स के खिलाफ लड़ने का अच्छा मौका था।

यही वजह थी कि महात्मा गांधी जी ने इस खिलाफत आंदोलन को समर्थन दे दिया और साथ ही अपना केसर-ए-हिंद पदक (Kesar-e-Hind Medal) अंग्रेजों को वापस कर दिया।


खिलाफत समिति

23 नवम्बर 1919 को दिल्ली में ‘अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी’ (All India Khilafat Committee) के अधिवेशन का आयोजन किया गया था।

इस अधिवेशन की अध्यक्षता महात्मा गांधी जी ने की थी। महात्मा गांधी जी के मुताबिक अंग्रेजों को असहयोग और स्वदेशी की नीति अपनाई गई।

साल 1918- 19 के बीच भारत में खिलाफत आंदोलन में शौकत अली, मौलाना मोहम्मद अली एवं अबुल कलाम आजाद जैसे मुस्लिम नेताओं के सहयोग से जोर पकड़ता चला गया।

इसके बाद सितम्बर 1919 में खिलाफत समिति (Khilafat Committee) का गठन किया गया। महात्मा गांधी जी के कहने पर शिष्टमंडल के नेता डॉ अंसारी वायसराय से मिलने इंग्लैंड गए थे।


खिलाफत आंदोलन में अली ब्रदर्स की रही मुख्य भूमिका

मार्च 1920 को मोहम्मद अली और कत अली के नेतृत्व में एक शिष्टमंडल इंग्लैंड गया।पर ये दोनों दल अपने लक्ष्य को हासिल करने में नाकाम रहे।

जिसके बाद 20 जून 1920 को इलाहाबाद में हुई हिन्दू-मुस्लिमों की संयुक्त बैठक (Allahabad Hindu-Muslim joint meeting) हुई।

इस संयुक्त बैठक में ‘असहयोग आंदोलन’ (Non-Cooperation Movement) के अस्त्र का अपनाए जाने का फैसला किया गया, तब से 31 अगस्त 1920 तक का दिन खिलाफत दिवस (Khilafat Day) के रूप में मनाया गया।

इसी बीच अखिल भारतीय कांग्रेस समेत सभी अन्य दलों ने असहयोग आंदोलन का भी आह्वान कर दिया।


खिलाफत आंदोलन की प्रमुख वजह

  • प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने जर्मनी, ऑस्ट्रिया तथा हंगरी का साथ दिया और ब्रिटेन और अन्य देशों के विरुद्ध प्रथम विश्व युद्ध मे भाग लिया। जिसका नतीजा ये हुआ की तुर्की बुरी तरह से हार गई। जिस में तुर्कस्तान का भारी नुकसान भी उठाना पडा।
  • दुनिया भर के मुस्लिम धर्मीय लोगों को तुर्की के खलीफा से आस्था और भावनात्मक जुड़ाव था क्योंकि वे तुर्की के खलीफा को समूचे मुस्लिम समुदाय का धर्म गुरु का पद माना जाता था। इसलिये प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की के खलीफा का पद खतरे में आ गया था। जिसकी बदौलत पुरी दुनिया मे मुस्लीम समुदाय में ब्रिटेन के विरुध्द गुस्से के हालात और आक्रोश निर्माण हुए थे।
  • इसी दौरान भारत में साल 1919 में महात्मा गांधी जी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन छेड़ दिया गया था। जिसमें सभी प्रकार के ब्रिटिश वस्तुओं और सेवाओं का विरोध किया गया था। उस समय में असहयोग आंदोलन काफी बडे स्तर पर चलाया गया था जिसकी व्याप्ती पुरे भारत भर में फैलने लगी थी।
  • इसलिए असहयोग आंदोलन के माध्यम से अपनी मांगे और आवाज को बुलंद करने के उद्देश्य से अली बंधु और उनके सहयोगियों ने अबुल कलाम आजाद के साथ “खिलाफत आंदोलन” के तौर पर, औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ तुर्की के खलीफा के समर्थन में आंदोलन शुरू कर दिया था।
  • खिलाफत आंदोलन में भारत के मुस्लिमों की स्पष्ट रूप से मांग थी कि तुर्की के खलीफा का पद कायम रहे तथा दुनियाभर के पवित्र मुस्लिम स्थानो पर तुर्की के खलीफा सुल्तान का नियंत्रण रहे।
  • भले ही तुर्की प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन से हार गया था पर भारत के मुस्लिमों की “खिलाफत आंदोलन” द्वारा मांग थी की खलिफा के अधीन कम से कम इतना भू-भाग रहे जिस से वो इस्लाम की रक्षा कर सके एव उसे किसी प्रकार से क्षति नही होनी चाहिये।
  • भारत के मुस्लिमों को डर था कि ब्रिटिश सरकार के उपनिवेश और जुलमी शासन की चपेट मे इराक,सिरीया, अरब और फिलिस्तीन आदि. मुस्लिम प्रांत ना आए जिससे भविष्य में इस्लाम और खलीफा को नुकसान उठाना पडे। ये भी खिलाफत आंदोलन की प्रमुख वजह थी, जिसने इस आंदोलन से देशभर के मुस्लिम को जोड़ने का कार्य किया था।
  • महात्मा गांधी जी को खिलाफत आंदोलन के माध्यम से देश के ज़्यादातर मुस्लिमों को आजादी के संघर्ष में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ एकजुट करने का अच्छा मौका प्राप्त हुआ था। इसलिए असहयोग आंदोलन के प्रवाह में मुस्लिमों को खिलाफत आंदोलन से जोड़ा गया था, जिससे काफी हद तक इस आंदोलन मजबूती मिली।
  • खिलाफत और असहयोग आंदोलन के पूर्व देश मे कुछ ऐसी घटना हुई थी जिससे सामान्य जनमानस अंग्रेजो के खिलाफ काफी आक्रोश से भरा हुए था। जैसा के जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Kand), रौलट एक्ट (1919) जैसे काले कानून के रूप में माना गया था। जिसमें बगैर पुछ्ताछ और किसी गुनाह के बगैर अंग्रेज सरकार लोगों को जेल में बंद कर देती थी, इन सभी घटनाओं ने असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन के लिये पृष्ठभूमि का निर्माण किया था।
  • ब्रिटेन द्वारा तुर्की के सुल्तान से सीवर्स संधि (Treaty Of Sevres) के सारे हक छीन लिये गये थे, जिससे तुर्की का अस्तित्व ही खतरे में आ गया था। ये भी प्रमुख वजह थी जिससे भारत के मुस्लिम ब्रिटिश सरकार से काफी नाराज हुए थे।

उपरोक्त दिये गये सभी कारणे थे जिसका मिला-जुला परिणाम ये हुआ था की भारत मे मुस्लिम वर्ग ने महात्मा गांधी जी के नेतृत्व मे खिलाफत आंदोलन के माध्यम से अंग्रेजो के विरुध्द अपना आक्रोश और विरोध प्रकट किया था।

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खिलाफत आंदोलन की महत्वपूर्ण जानकारी

ये अंग्रेजों के खिलाफ एक तुर्की का गठबंधन: भारत सहित दुनिया भर के मुस्लिम तुर्की के सुल्तान को अपना आध्यात्मिक नेता खलीफा मानते थे।

प्रथम विश्व युद्ध (First world war) के दौरान तुर्की ने अंग्रेजों के खिलाफ जाते हुए ऑस्ट्रिया और जर्मनी के साथ गठबंधन बनाया। 

भारतीय मुसलमानों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विश्वास के साथ ब्रिटिन का समर्थन किया था कि तुर्क साम्राज्य के पवित्र स्थान खलीफा को दे दिया जाएगे।

हालांकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही तुर्क साम्राज्य विभाजित कर अलग-अलग भाग में बाट दिया गया और खलीफा को तुर्की की सत्ता से हटा दिया।

इससे भारतीय मुस्लिम बहुत नाराज हुए थे। अली भाइयों, मोहम्मद अली और शौकत अली ने ब्रिटिश सरकार के विरोध में खिलाफत आंदोलन को शुरू किया। 

भारतीय मुसलमानों ने अंग्रेजों से निम्नलिखित मांगे रखी-

मुस्लिम पवित्र स्थानों पर खलीफा का नियंत्रण बरकरार रखा जाये और क्षेत्रीय व्यवस्था के बाद खलीफा को पर्याप्त क्षेत्र दिया जाये।

खिलाफत आंदोलन को सफल बनाने हेतु कांग्रेस का सहयोग –

महात्मा गांधी खिलाफत के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ सत्याग्रह आंदोलन और असहयोग आंदोलन शुरू करने के पक्ष में थे, पर कांग्रेस इस तरह की राजनीतिक कार्रवाई पर एकजुट नहीं हुई थी।

बाद में कांग्रेस ने अपना समर्थन देने की इच्छा ज़ाहिर की क्योंकि खिलाफत आंदोलन हिंदुओं और मुसलमानों को एकजुट करने का और स्वतंत्रता संग्राम में मुस्लिम लोगों की भागीदारी को शामिल करने का सुनहरा अवसर था।

मुस्लिम लीग ने भी राजनीतिक पटलों पर कांग्रेस और कांग्रेस के आंदोलन को पूर्ण समर्थन दिया था। 


कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर संक्षिप्त में

अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का गठन किस समय किया गया था?

अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का गठन सन् 1919 में किया गया था और अखिल भारतीय खिलाफत दिवस को 17 अक्टूबर 1919 को मनाया जाता है

खिलाफत समिति का गठन कब और कहां हुआ था?

खिलाफत समिति का गठन मुंबई में मार्च 1919 में किया गया था शौकत अली और मोहम्मद अली की इस गठन में मुख्य भूमिका थी यह समिति खलीफा के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए थी

महात्मा गांधी अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी के अध्यक्ष कब चुने गए थे?

24 नवंबर 1919 को महात्मा गांधी जी को अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी का अध्यक्ष चुना गया

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